वो बचपन वाली शाम फिर लौट कर नहीं आती
वो बचपन
वाली ख़्वाहिशें फिर इस मन में नहीं
आती।
वो
बचपन वाली बरसात फिर नहीं बरसती
वो कागज़
की कश्ती वो कागज़ के जहाज फिर
नहीं बनते।
वो बचपन वाले खेल फिर वापस
नहीं आते वो
बचपन वाले दुआ के सितारे
फिर से नहीं टिमटिमाते।
वो बचपन वाला
माँ पापा से मिलने वाला एक रूपया
फिर
से नहीं मिलता।वो बचपन ही था जो हर
गम से
अनजान हुआ करता था।वरना तरूणाई
भरी जिंदगी ने
तो रूसवा ही कर दिया।हर
इम्तिहान का दौर आग के
दरिया सा पार करने
जैसा कर दिया।वो दौर हुआ करता
था अपनी
ही दुनियाँ में खोये रहने का। जाने क्यों अब
वो
बचपन वाला दौर खो सा गया।